दिन में दो बार यह प्रयोग करने से नाभि अपने स्थान पर आ जाती है तथा दस्त आदि उपद्रव शांत हो जाते हैं.
(6) जिनकी नाभि डिगी हो लेकिन बहुत ज्यादा तकलीफ में न हो वो किसी छींक लाने वाली चीज जैसे नकछिकनी आदि के द्वारा तेज छींकें तो नाभि अपने स्थान पर आ जाती है.
काला चना अक्सर ही घरों में सब्जी के रूप में खाया जाता है। काले चने में विटामिन-ए,बी.सी,डी, कैल्शियम, फाइबर, आयरन, कार्बोहाइड्रेट, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल उच्च रहता है उन्हें काले चनों का सेवन करना चाहिए। रात को एक मुट्टी काले चने पानी में भिगोकर छोड़ दें और सुबह इन चनों को खाली पेट खाएं। साथ ही जिस पानी में चने भिगोये थे उसे फेंकें नहीं बल्कि उस पानी को भी पियें। इसके अलावा भूने चने खाना भी आपके लिए लाभदायक है।
4👉 तुलसी के पत्तो का रस,अदरख का रस और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर 1-1चम्मच की मात्रा में दिन में 3 से 4 बार सेवन करने से सर्दी, जुखाम व खांसी दूर होती है।
10👉 भोजन में प्रतिदिन 20 से 30 प्रतिशत ताजा सब्जियों का प्रयोग करने से जीर्ण रोग ठीक होता है उम्र लंबी होती है शरीर स्वस्थ रहता है।
१-रोज प्रात:काल सूर्योदयसे पहले उठो। उठते ही भगवान्को प्रणाम करो, फिर हाथ-मुँह धोकर उष:पान करो। ठंडे जलसे आँखें धोओ।
२-पेशाब-पाखाने की हाजत को कभी न रोको। पेट में मल जमा न होने दो।
३-रोज दतुअन करो; भोजन करके हाथ, मुँह, दाँत अवश्य धोओ।
४-प्रतिदिन प्रात:काल स्नान करके सूर्य को अर्घ्य दो।
५-दोनों समय (प्रातः और संध्या) नियमपूर्वक श्रद्धा के साथ भगवद प्रार्थना या संध्या करो।
६-हो सके तो प्रात:काल शुद्ध वायु का सेवन अवश्य करो।
७-भूख से अधिक न खाओ, जीभ के स्वाद के वश में न होओ; पवित्रता से बना हुआ-पवित्र कमाई का अन्न खाओ; किसी का भी जूठा कभी न खाओ, न किसी को अपना जूठा खिलाओ, मांस-मद्य का सेवन कभी न करो।
८-भोजन के समय जल न पीओ या बहुत थोड़ा पीओ।
९-पान, तंबाकू, सिगरेट, बीड़ी, चाय, काफी, भाँग, अफीम, गाँजा, चरस, ताश, चौपड़, शतरंज आदिका व्यसन न डालो; दवा अधिक सेवन न करो। पथ्य, परहेज, संयम, युक्ताहार-विहार का अधिक ध्यान रखो।
१०-दिन में न सोओ, रात में अधिक न जागो, छः घंटे से अधिक न सोओ।
११-नियमित रूप से धर्मग्रन्थों का कुछ स्वाध्याय अवश्य करो।
१२-रोज नियमितरूप से कम-से-कम २५,००० भगवाण के नामों का जप अवश्य करो।
१३-संतों के चरित्र और उन की दिव्य वाणी को अध्ययन करो।
१४-जूआ कभी न खेलो, बाजी न लगाओ, होड़ न बदो।
१५–सिनेमा, स्त्रियों का नाच आदि न देखो।
१६-कपड़े सादे पहनो और साफ रखो, मैले न होने दो; परंतु फैशन का खयाल बिलकुल न रखो। कपड़े बिगाड़कर भी न पहनो, बहुत कीमती कपड़े न पहनो।
१७-हजामत और नख न बढ़ने दो, परंतु शौक से दिन में दो बार बनाओ भी नहीं।
१८-अपने शरीरको सुन्दर दिखलाने का प्रयत्न न करो।
१९-किसी भी हालत में यथा साध्ये उधार न लो, उधार लेकर खर्च करने से आदत बिगड़ जाती है; जबतक उधार मिलता है, खर्च बढ़ता ही जाता है; पीछे बड़ी कठिनाई और बेइज्जती होती है।
२०-तकलीफ सहकर भी आमदनीसे कम खर्च करो, अधिक खर्च करनेवालों या अमीरोंको आदर्श न मानकर मितव्ययी पुरुषों और गरीबों की ओर ध्यान दो। मितव्ययी पुरुष आमदनी में से कुछ बचाकर अपनी ताकत के अनुसार दुःखियों की सेवा कर सकता है, चाहे एक पैसे से ही हो; खरी कमाई से बचे हुए एक पैसे के द्वारा भी की हुई दीन-सेवा बहुत महत्त्वकी होती है। मितव्ययी पुरुष के बचाये हुए पैसे उसके आड़े वक्तपर | काम आते हैं। जो अधिक खर्च करता है, उसकी आदत इतनी बिगड़ जाती है कि वह बहुत अधिक आमदनी होनेपर भी एक पैसा बचाकर दीनों की सेवा नहीं कर सकता। वह अपने खर्च से ही परेशान रहता है और आमदनी न होने या कम होनेकी सूरत में उसपर कष्टों का पहाड़ टूट पड़ता है। मितव्ययी और अच्छी आदतवाले पुरुष ऐसी अवस्थामें दुःखी नहीं हुआ करते।
२१–नौकरों से दुर्व्यवहार न करो, दुःख में उनकी सेवा-सहायता करो। उनका तिरस्कार-अपमान कभी न करो। उनकी आवश्यकताओं का खयाल रखो और अपनी परिस्थिति के अनुसार उन्हें पूरा करनेकी चेष्टा करो।
२२-अपरिचित मनुष्य से दवा न लो, जादू-टोना किसीसे भी न करवाओ।
२३–नोट दूना बनानेवाले, आँकड़ा बतानेवाले, सोना बनानेवाले, सट्टा बतलाने वाले लोगों से सावधान रहो; ऐसा करनेवाले प्रायः ठग होते हैं।
२४-किसी अनजाने को पेट की बात न कहो,जाने हुए भी सबसे न कहो; परंतु अपने सच्चे हितैषी बन्धुसे छिपाओ भी नहीं।
२५-जहाँ भी रहो किसी वयोवृद्ध अनुभवी पुरुषको अपना हितैषी जरूर बना लो। विपत्ति के समय उसकी सलाह बहुत काम देगी।
२६-प्रेम सबसे रखो, परंतु बहुत ज्यादा सम्बन्ध स्थापित न करो। अनावश्यक दावतों में न जाओ और न दावत देने की ही आदत डालो।
२७-जो कुछ काम करो, अच्छी तरह से करो। बिगाड़कर जल्दी और ज्यादा करनेकी अपेक्षा सुधारकर थोड़ा करना भी अच्छा है, परंतु आलस्य-प्रमादको समीप न आने दो।
२८-जोश में आकर कोई काम न करो।
२९-किसी से विवाद या तर्क न करो, शास्त्रार्थ न करो। अपने को सदा विद्यार्थी ही समझो। समझदारी का अभिमान न करो। सीखने की धुन रखो।
३०-मीठा बोलो, ताना न मारो, कड़वी जबान न कहो; बीचमें न बोलो, बिना पूछे सलाह न दो; सर्च बोलो, अधिक न बोलो, बिलकुल मौन भी न रहो; हँसी-मजाक न करो; निन्दा-चुगली न सुनो; गाली न दो, शाप-वरदान न दो।
३१-नम्र और विनयशील रहो, झूठी चापलूसी न करो, ऐंठो नहीं, मान दो, पर मान न चाहो।
३२-दूसरे के द्वारा अच्छा बर्ताव होनेपर ही मैं उसके साथ अच्छा करूँगा, ऐसी कल्पना न करो। अपनी ओर से पहलेसे ही सबसे अच्छा बर्ताव करो, जो अपनी बुराई करे उसके साथ भी।
३३-गरीबों के साथ सहानुभूति रखो।
३४-किसी फर्म में, संस्था में या किसी व्यक्तिके लिये काम करो-नौकरी करो तो पूरी वफादारी से करो। सदा तन-मन-वचनसे उसका हित-चिन्तन ही करते रहो।
३५-जहाँ रहो अपनी ईमानदारी, वफादारी, होशियारी, कार्य-कुशलता, मीठे वचन, परिश्रम और सचाईसे अपनी जरूरत पैदा कर दो। अपना स्थान स्वयं बना लो।
३६-प्रत्यक्ष लाभ दीखने पर भी अनुचित लोभ न करो। अपनी ईमानदारी को हर हालत में बचाये रखो। दूसरे का हक किसी तरह भी स्वीकार न करो। ईमान न बिगाड़ो।
३७-आचरणों को-चरित्र को सदा पवित्र बनाये रखनेकी कोशिश करो।
३८-बिना ही कारण मान-बड़ाई के लिये न तरसो। गरीबी से न डरो, बेईमानी और बुरी आदतों से अवश्य भय करो।
३९-परायी स्त्री को जलती हुई आग या सिंह से भी अधिक भयानक समझो। स्त्री-सम्बन्धी चर्चा न करो, स्त्री-चिन्तन न करो, स्त्रियों के चित्र न देखो, स्त्रियोंके सम्बन्धकी पुस्तकें न पढ़ो। यथासाध्य स्त्री सहवास अपनी स्त्री से भी कम करो। यही बात स्त्री के लिये पर-पुरुष के सम्बन्ध में है।
४०-सदा अशुभ भावनाओं से अपने को न घिरा रहने दो। उनको दूर भगाये रखो।
४१-विपत्ति में धैर्य और सत्यको न छोड़ो, दूसरे पर दोष न दो।
४२–जहाँतक हो क्रोध न आने दो। क्रोध आ जाय तो उसका कुछ प्रायश्चित्त करो।
४३-दूसरों के दोष न देखो, अपने देखो। किसीको छोटा न समझो। अपना दोष स्वीकार करनेको सदा | तैयार रहो।
४४-अपने दोषों की डायरी रखो; रातको उसे रोज देखो और कल ये दोष नहीं होंगे, ऐसा दृढ़ निश्चय करो।
४५-वासना-कामनाओं को जीतने की चेष्टा करो। कामनापूर्ति की अपेक्षा कामनाओं को जीतने में ही सुख है।
४६-अहिंसा, सत्य और दयाको विशेष बढ़ाओ। ४७-जीवन का प्रधान लक्ष्य एक ही है, यह दृढ़ निश्चय कर लो। वह लक्ष्य है-‘भगवान्की उपलब्धि।अर्थात मोक्ष प्राप्ति इसके लिए स्वयं व दुसरो के त्रिहिक दुःख(दैहिक दैविक भौतिक) दूर करने हेतु प्रयासरत्त रहना
४८–विषयचिन्तन, अशुभ चिन्तनका त्याग करके यथासाध्य भगवच्चिन्तन का अभ्यास करो।
४९-भगवान् जो कुछ दें, उसीको आनन्दपूर्वक ग्रहण करनेका अभ्यास करो।
५०–इज्जत, मान और नाम का मोह न करो।
५१-भगवान की कृपा में विश्वास करो।
अपने जीवन औरो के जीवन को स्वस्थ व समृध्द बनाने हेतु भाई राजीव दीक्षित जी को अवश्य सुने
निरोगी रहने हेतु महामन्त्र
मन्त्र 1 :-
• भोजन व पानी के सेवन प्राकृतिक नियमानुसार करें
• रिफाइन्ड नमक,रिफाइन्ड तेल,रिफाइन्ड शक्कर (चीनी) व रिफाइन्ड आटा ( मैदा ) का सेवन न करें
• विकारों को पनपने न दें (काम,क्रोध, लोभ,मोह,इर्ष्या,)
• वेगो को न रोकें ( मल,मुत्र,प्यास,जंभाई, हंसी,अश्रु,वीर्य,अपानवायु, भूख,छींक,डकार,वमन,नींद,)
• एल्मुनियम बर्तन का उपयोग न करें ( मिट्टी के सर्वोत्तम)
• मोटे अनाज व छिलके वाली दालों का अत्यद्धिक सेवन करें
• भगवान में श्रद्धा व विश्वास रखें
मन्त्र 2 :-
• पथ्य भोजन ही करें ( जंक फूड न खाएं)
• भोजन को पचने दें ( भोजन करते समय पानी न पीयें एक या दो घुट भोजन के बाद जरूर पिये व डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पिये)
• सुबह उठेते ही 2 से 3 गिलास गुनगुने पानी का सेवन कर शौच क्रिया को जाये